रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव अब और बढ़ सकता है।अमेरिकी सीनेट ने ऐसा बिल पास कर दिया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता साफ किया गया है। इस फैसले का सीधा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं...
डिजिटल डेस्क, पर्दाफाश। रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव अब और बढ़ सकता है।अमेरिकी सीनेट ने ऐसा बिल पास कर दिया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता साफ किया गया है। इस फैसले का सीधा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेट में यह बिल 86 वोट के मुकाबले 11 वोट से पारित हुआ है। इसे रूस और ईरान पर प्रतिबंधों को और कड़ा करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। अभी यह कानून लागू नहीं हुआ है। इसे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से भी मंजूरी मिलना बाकी है।
बिल में ऐसा क्या है, जिससे भारत की चिंता बढ़ सकती है?
अब सवाल है कि आखिर इस बिल में ऐसा क्या है, जिससे भारत की चिंता बढ़ सकती है, प्रस्तावित कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगा सकें। इसका मकसद रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के लिए उसकी वित्तीय क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला
भारत के लिए यह मामला इसलिए बेहद अहम है क्योंकि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में काफी बढ़ोतरी की थी। रूस से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए अपेक्षाकृत सस्ता और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। अमेरिका पहले भी रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगा चुका है। ऐसे में अगर नया कानून लागू होता है और भारत पर इसका इस्तेमाल किया जाता है, तो दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों पर दबाव और बढ़ सकता है।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से अभी मिलना बाकी
हालांकि एक बड़ी बात यह भी है कि 100 प्रतिशत टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है लेकिन इसका इस्तेमाल किया जाएगा या नहीं, यह आगे के राजनीतिक और कार्यकारी फैसलों पर निर्भर करेगा। अब अगला पड़ाव अमेरिकी प्रतिनिधि सभा है। हाउस से मंजूरी मिलने के बाद ही यह बिल राष्ट्रपति के पास जाएगा।
भारत से सामने कैसी चुनौती?
भारत के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और सस्ते रूसी तेल की जरूरत को बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को भी संतुलित करे। यानी आने वाले दिनों में रूस का तेल सिर्फ ऊर्जा का मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और वैश्विक कूटनीति का भी बड़ा मुद्दा बन सकता है।
रिपोर्ट: कल्पना पाण्डे