पिछले कुछ समय में ईरान (Iran) की ओर से हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बावजूद, सऊदी अरब और यूएई (UAE) जैसे खाड़ी देशों (Gulf Nations) ने जवाबी हमला न करने का फैसला किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों ने युद्ध के बजाय शांति और कूटनीति का रास्ता चुना है।
नई दिल्ली। पिछले कुछ समय में ईरान (Iran) की ओर से हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बावजूद, सऊदी अरब और यूएई (UAE) जैसे खाड़ी देशों (Gulf Nations) ने जवाबी हमला न करने का फैसला किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन देशों ने युद्ध के बजाय शांति और कूटनीति का रास्ता चुना है।
अर्थव्यवस्था को खतरा
सऊदी अरब और यूएई जैसे देश अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से हटाकर पर्यटन और व्यापार (जैसे विजन 2030) पर ले जा रहे हैं। युद्ध होने से उनके करोड़ों डॉलर के प्रोजेक्ट्स और विदेशी निवेश डूब सकते हैं।
तेल की सप्लाई
खाड़ी देशों को डर है कि युद्ध छिड़ने पर ईरान ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ को बंद कर सकता है, जहाँ से दुनिया का अधिकांशतः तेल गुजरता है। इससे इन देशों की कमाई रुक जाएगी।
आम जनता की सुरक्षा
ईरान के पास कई छोटे लड़ाकू गुटों का समर्थन है। अगर खाड़ी देश सीधा हमला करते, तो ईरान इन गुटों की मदद से उनके शहरों और तेल के कुओं पर बड़े हमले करवा सकता था।
बातचीत का रास्ता
कतर और ओमान जैसे पड़ोसी देश लगातार ईरान के साथ बातचीत कर रहे हैं। खाड़ी देशों का मानना है कि मिसाइल का जवाब मिसाइल से देने के एक साथ बैठकर समस्याओं का समाधान निकलना बेहतर है।
बचाव तंत्र पर भरोसा
अमेरिका की मदद से इन देशों के पास बेहतरीन ‘डिफेंस सिस्टम’ है, जिसने ईरान के ज्यादातर ड्रोनों को हवा में ही मार गिराया। बहुत अधिक नुकसान न होने की वजह से उन्होंने तुरंत जवाबी कार्रवाई की जरूरत नहीं समझी।
बता दें कि खाड़ी देश इस समय अपनी तरक्की पर ध्यान दे रहे हैं और वे किसी भी ऐसी महायुद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते है जो उनके विकास को कई साल पीछे धकेल दे।
रिपोर्ट : सुशील कुमार साह