सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा अगर किसी स्कूल में अधिकारी को बच्चे के यौन शोषण (Sexual Harassment) की शिकायत मिलती है तो वह खुद जांच-पड़ताल करके मामले को रफा-दफा नहीं कर सकते। अधिकारी घटना की रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा अगर किसी स्कूल में अधिकारी को बच्चे के यौन शोषण (Sexual Harassment) की शिकायत मिलती है तो वह खुद जांच-पड़ताल करके मामले को रफा-दफा नहीं कर सकते। अधिकारी घटना की रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने कहा कि बच्चों के यौन अपराध संरक्षण अधिनियम 2012 (POCSO Act) की धारा 19 के तहत घटना की रिपोर्ट ने करने पर पोक्सो एक्ट (POCSO Act) की धारा 21 के तहत आपराधिक जिम्मेदारी बनती है, जिसमें छह महीने तक की जेल या जुर्माना दोनों हो सकते हैं।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने स्कूल की हेडमिस्ट्रेस को आरोपमुक्त करने का फैसला रद्द कर दिया। उस पर आरोप था कि उसने एक सीनियर छात्र द्वारा 8 साल की छात्रा के साथ रेप की शिकायत को दबा दिया था। कोर्ट ने कहा कि POCSO Act की धारा 19(1) के तहत “यह जानकारी होना कि ऐसा अपराध हुआ है” वाक्यांश का मतलब मकसद को ध्यान में रखते हुए निकाला जाना चाहिए, ताकि पीड़ित से सीधे मिली भरोसेमंद जानकारी के आधार पर हुई जानकारी को भी इसमें शामिल किया जा सके।
कोर्ट ने कहा कि जब कोई पीड़ित बच्चा किसी व्यक्ति को बताता है कि उसके साथ कोई अपराध हुआ है। तो यह आसानी से माना जा सकता है कि जिस व्यक्ति को पीड़ित बच्चे ने यह जानकारी दी है। उसे पता है कि ऐसा अपराध हुआ है। कोर्ट ने आगे कहा कि POCSO Act के मकसद को पूरा करने के लिए,यह जानकारी होना कि ऐसा अपराध हुआ है। इसका अर्थ इस तरह निकाला जाना चाहिए कि इसमें एक्ट के तहत दंडनीय अपराध के बारे में भरोसेमंद जानकारी मिलने पर हुई जानकारी भी शामिल हो।
यह मामला अरुणाचल प्रदेश के एक स्कूल से जुड़ा है, जहां एक आठ साल की बच्ची ने अपने साथ सीनियर छात्र द्वारा किए गए यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) की शिकायत अपनी शिक्षिका, बड़ी बहन और सहपाठियों से की थी। लेकिन स्कूल प्रशासन ने इस पर पर्दा डालने की कोशिश की।
गुवाहाटी हाईकोर्ट (Guwahati High Court) और ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आरोपित शिक्षिका और प्रधानाध्यापिका को बरी कर दिया था कि बच्ची के शरीर पर चोट के कोई बाहरी निशान नहीं थे, इसलिए उन्हें अपराध का यकीन नहीं हुआ।
चोट के निशान न होना चुप रहने का बहाना नहीं
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) के मामलों में हमेशा शारीरिक चोट के निशान हों, यह जरूरी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुवाहाटी हाईकोर्ट (Guwahati High Court) के आदेश को पलटते हुए कहा कि उस शिक्षिका के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 21 और आइपीसी की धारा 176 के तहत आरोप तय करने के पर्याप्त सबूत हैं, जिसने बच्ची से सीधे शिकायत मिलने के बावजूद अधिकारियों को सूचित नहीं किया।
जांच के नाम पर शिकायत को खारिज न करें
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने यह भी कहा कि कई बार बच्चे अपनी उम्र के कारण घटना की गंभीरता को ठीक से समझा नहीं पाते। ऐसे में धुंधली तस्वीर साफ करने के लिए उनसे संक्षिप्त पूछताछ की जा सकती है, लेकिन इसका उद्देश्य उनकी शिकायत को दबाना या खारिज करना नहीं, बल्कि सच्चाई को समझना होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में पीड़ित की बड़ी बहन, सहेली और स्कूल की हेड गर्ल भी शामिल थीं, लेकिन चूंकि वे नाबालिग हैं, इसलिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
साथ ही, संस्था के हर उस व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो प्रत्यक्ष रूप से शिकायत का हिस्सा नहीं था। यह फैसला देश के हर नागरिक, विशेषकर शिक्षकों और अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाता है।