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दशकों बाद एमपी के जंगल में दिखी ‘उड़ने वाली बिल्ली’, कैमरे में कैद हुई दुर्लभ तस्वीर

दशकों के लंबे इंतजार के बाद, भारत में विलुप्ति की कगार पर खड़े बेहद दुर्लभ जंगली बिल्ली की प्रजाति कैराकल (Caracal) जिसे उड़ने वाली बिल्ली भी कहते है को कूनो के जंगलों में देखा गया है। हाल ही में पार्क के अंदर लगे एक कैमरा ट्रैप में इस शानदार शिकारी की तस्वीर कैद हुई है...

By Harsh Gautam 
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कूनो नेशनल पार्क,मध्य प्रदेश: अफ्रीकी चीतों के पहले भारतीय घर कूनो नेशनल पार्क (KNP) से वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद और हैरान करने वाली खबर आई है। दशकों के लंबे इंतजार के बाद, भारत में विलुप्ति की कगार पर खड़े बेहद दुर्लभ जंगली बिल्ली की प्रजाति कैराकल (Caracal) जिसे उड़ने वाली बिल्ली भी कहते है को कूनो के जंगलों में देखा गया है। हाल ही में पार्क के अंदर लगे एक कैमरा ट्रैप में इस शानदार शिकारी की तस्वीर कैद हुई है।

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विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस दुर्लभ बिल्ली की तस्वीरें साझा करते हुए इसे कूनो के इकोसिस्टम की एक बड़ी रिकवरी बताया। करीब 10 महीने पहले इस प्रजाति को पश्चिमी मध्य प्रदेश के गांधी सागर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में भी देखा गया था।

हवा में शिकार करने वाली ‘फ्लाइंग कैट’ की खासियत

हिंदी में सियाहघोष के नाम से मशहूर कैराकल अपनी फुर्ती के लिए जाना जाता है। हवा में करीब 3 मीटर (10 फीट) तक की ऊँची छलांग लगाकर उड़ते हुए पक्षियों का शिकार करने की अद्भुत क्षमता के कारण इसे फ्लाइंग कैट या उड़ने वाली बिल्ली भी कहा जाता है। लाल-भूरे या रेतीले रंग के शरीर वाली इस बिल्ली की मुख्य पहचान इसके लंबे पैरों के साथ कानों के ऊपर निकले काले बालों के गुच्छे और तीखे कैनाइन दांत हैं। कभी मध्य और पश्चिमी भारत के घास के मैदानों में राज करने वाला यह जीव, हैबिटेट लॉस के कारण देश में सबसे दुर्लभ शिकारियों की सूची में आ चुका है।

सिर्फ चीता नहीं, पूरे इकोसिस्टम का सुधर रहा स्वास्थ्य

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कूनो में कैराकल की यह वापसी महज एक संयोग नहीं है, बल्कि प्रोजेक्ट चीता के दूरगामी परिणामों का हिस्सा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव का मानना है कि कूनो में सिर्फ चीतों को बसाना मकसद नहीं था, बल्कि पूरे फॉरेस्ट इकोसिस्टम को री-स्टोर करना था।

पार्क के फील्ड डायरेक्टर उत्तम शर्मा के मुताबिक कूनो में अब भारतीय भेड़िया और एशियाई जंगली कुत्ते ‘ढोल’ जैसी प्रजातियां भी लगातार दिख रही हैं। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि पार्क में सुरक्षा सख्त हुई है और सोलर-पावर्ड सिस्टम के जरिए कूनो नदी से 15 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाकर ऊँचाई पर बने तालाबों को पानी से भरा जा रहा है। कूनो का सुधरता वाटर मैनेजमेंट और घास के मैदानों की बेहतर स्थिति ही इस फ्लाइंग कैट को वापस खींच लाई है।

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