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सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी, काश जजों की नियुक्ति भी चुनाव आयुक्तों की तरह इतनी तेज होती…,मामले की अगली सुनवाई 14 मई को

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों की उस विफलता पर तल्ख टिप्पणी की जिसमें उन्होंने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से कार्य करने के लिए आवश्यक कानून बनाने में सालों की देरी की। जस्टिस दीपांकर दत्ता (Justice Dipankar Datta) और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा (Justice Satish Chandra Sharma) की पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अनूप बारनवाल (Anoop Baranwal) फैसले के बावजूद संसद ने अब तक जरूरी कानून क्यों नहीं बनाया? 

By santosh singh 
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों की उस विफलता पर तल्ख टिप्पणी की जिसमें उन्होंने भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से कार्य करने के लिए आवश्यक कानून बनाने में सालों की देरी की। जस्टिस दीपांकर दत्ता (Justice Dipankar Datta) और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा (Justice Satish Chandra Sharma) की पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अनूप बारनवाल (Anoop Baranwal) फैसले के बावजूद संसद ने अब तक जरूरी कानून क्यों नहीं बनाया?  इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति को लेकर भी टिप्पणी की और कहा कि काश जजों की नियुक्ति इतनी तेजी से होती।

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सीनियर वकील विजय हंसारिया (Senior Advocate Vijay Hansaria) ने दलील दी कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जल्दबाजी में हुई। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से ठीक से राय नहीं ली गई। 13 मार्च 2024 को उनको 200 नामों की लिस्ट दी गई थी और अगले ही दिन नाम चुन लिए गए।

याचिकाकर्ताओं ने जस्टिस दीपांकर दत्ता (Justice Dipankar Datta) और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा (Justice Satish Chandra Sharm की पीठ के समक्ष यह तर्क देते हुए कि चुनाव आयोग (Election Commission) की स्वतंत्रता न्यायपालिका की स्वतंत्रता के समान ही महत्वपूर्ण है, यह कहा कि कार्यपालिका और सरकार को चुनाव आयोग (Election Commission) की नियुक्तियों में दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे चापलूसों की नियुक्ति होगी, जिससे चुनाव आयोग (Election Commission) की निष्पक्षता गंभीर रूप से प्रभावित होगी, जो गणतंत्र और लोकतंत्र की आधारशिला है। याचिकाकर्ता जया ठाकुर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया (Senior Advocate Vijay Hansaria) ने पीठ को बताया कि कुमार और संधू की नियुक्ति प्रभावी परामर्श के बिना की गई थी।

चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की जल्दबाजी पर उठाए सवाल

उन्होंने कहा कि 13 मार्च, 2023 तक नामों की सूची तैयार नहीं की गई थी और विपक्ष के नेता को 200 नामों की सूची दी गई थी, जिन पर विचार किया जा रहा था, लेकिन चयन समिति ने अगले ही दिन बैठक करके छह नामों का चयन कर लिया। उन्होंने कहा, “जब आप एक व्यक्ति को पूर्ण शक्ति दे देते हैं तो यही होता है। विपक्ष के नेता से एक दिन में इतने सारे नामों पर विचार करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

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अदालत ने क्या कहा

उनकी दलील का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की बेंच ने कहा कि हम केवल यही कह सकते हैं कि हम चाहते हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में ऐसी ही तत्परता दिखाई जाए। विशेषकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में। हालांकि, बेंच ने हंसारिया के इस आरोप को मानने से इनकार कर दिया कि अदालती कार्यवाही में बाधा डालने के लिए 15 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई से ठीक एक दिन पहले उनकी नियुक्ति की गई थी, क्योंकि इस आरोप को साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया था।

 विपक्ष में रहते हुए सभी स्वतंत्र संस्थाओं की मांग करते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही इस मुद्दे को भुला देते हैं

पीठ 2023 के अनूप बारनवाल बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए सुनवाई कर रही थी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल करने का प्रावधान किया गया था। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ को बताया कि हर सरकार ने कानून की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर चुनाव आयोग की नियुक्तियों पर अपना प्रभाव बनाए रखा। उन्होंने कहा कि विपक्ष में रहते हुए सभी स्वतंत्र संस्थाओं की मांग करते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही इस मुद्दे को भुला देते हैं।

डॉ बीआर आंबेडकर ने संविधान लागू होने के महज तीन साल बाद उन्होंने कहा था कि इस देश में लोकतंत्र काम नहीं कर रहा

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जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बहुमत की तानाशाही है। जो भी सत्ता में आता है, वही कर रहा है। यह देश के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस दौरान न्यायमूर्ति ने डॉ बीआर आंबेडकर का हवाला देते हुए BBC की एक पुरानी वीडियो का जिक्र किया, जिसमें संविधान लागू होने के महज तीन साल बाद उन्होंने कहा था कि इस देश में लोकतंत्र काम नहीं कर रहा।

2023 कानून को चुनौती

याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देती है। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का उल्लंघन करता है तथा अनूप बारनवाल फैसले में दिए गए CJI को शामिल करने के निर्देश की अवहेलना है। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने तर्क दिया कि बारनवाल फैसला केवल अंतरिम व्यवस्था नहीं था, बल्कि उसने संवैधानिक आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था।

विपक्षी सांसदों के निलंबन पर उठा सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने बताया कि जब यह विधेयक संसद में पारित किया गया, तब 141 विपक्षी सांसद निलंबित थे। प्रशांत भूषण ने दावा किया कि कानून बिना किसी सार्थक बहस के ‘वॉयस वोट’ के जरिए पास कर दिया गया। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा कि स्वतंत्र चुनाव आयोग के बिना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। लोकतंत्र का भविष्य इस मामले पर निर्भर करता है।

न्यायाधीशों की नियुक्ति का जिक्र

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सनवाई के दौरान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया का भी जिक्र करते हुए टिप्पणी की कि काश न्यायाधीशों की नियुक्ति में भी उतनी ही तेजी दिखाई जाती, जितनी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में दिखाई गई। वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से महज एक दिन पहले तेजी से पूरी कर दी थी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई 14 मई 2026 को होगी।

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