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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह, हलाला और तीन तलाक पर की तल्ख टिप्पणी, कहा- ‘पर्सनल लॉ की आड़ में अपराध स्वीकार नहीं’

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने कहा कि निकाह (Nikah) , हलाला (Halala) और तीन तलाक (Triple Talaq) जैसे रस्म-रिवाजों के चक्रव्यूह में फंसा कर महिला के यौन शोषण (Sexual Exploitation) की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि यह हमारे समाज का वह काला पन्ना है, जो संवैधानिक मूल्यों, समानता और मानवीय गरिमा की अवधारणा से कोसों दूर है।

By santosh singh 
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने कहा कि निकाह (Nikah) , हलाला (Halala) और तीन तलाक (Triple Talaq) जैसे रस्म-रिवाजों के चक्रव्यूह में फंसा कर महिला के यौन शोषण (Sexual Exploitation) की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि यह हमारे समाज का वह काला पन्ना है, जो संवैधानिक मूल्यों, समानता और मानवीय गरिमा की अवधारणा से कोसों दूर है। ये कृत्य न केवल कानूनन अपराध हैं, बल्कि ये समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोरने वाले हैं।

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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने पीड़िता के पूर्व पति, चाचा, मौलाना समेत अन्य रिश्तेदारों की याचिका खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानूनों की आड़ में अपराधों का संरक्षण नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया यह मामला नाबालिग संग सोची समझी रणनीति के साथ सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape) का है। इसकी गहन जांच जरूरी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने अमरोहा के निकाह (Nikah) , हलाला (Halala) और ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि देश का आपराधिक कानून किसी भी व्यक्तिगत कानून (Personal Law) या धार्मिक प्रथा के अधीन नहीं हो सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि यदि किसी मामले में गंभीर आपराधिक आरोप सामने आते है तो केवल पर्सनल लॉ का हवाला देकर एफआईआर (FIR) को रद्द नहीं किया जा सकता। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिविजन बेंच ने कथित ‘निकाह हलाला’ के नाम पर एक महिला के यौन शोषण (Sexual Exploitation)  और गैंग रेप (Gang Rape)  के मामले में यह टिप्पणी की।

9 आरोपियों को कोर्ट ने नहीं दी राहत

कोर्ट ने कहा कि सभी परिस्थितियों को देखते हुए कहा कि यह मामला हमारे समाज के एक ऐसे हिस्से की तस्वीर पेश करता है जो संवैधानिक मूल्यों और समानता, निजता, व्यक्तिगत गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 और 14 के उद्देश्यों से बहुत दूर है। कोर्ट ने इस मामले में शामिल सभी नौ आरोपियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

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जानें पूरा मामला

यह मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के थाना सैदनगली का है. पीड़िता (अभियोजिका) का निकाह 25 अप्रैल 2015 को जबरन अजहर नवाज के साथ कराया गया था, तब उसकी उम्र महज 15 वर्ष थी. जनवरी 2016 में पति ने उसे ‘तीन तलाक’ दे दिया। इसके बाद दोबारा शादी करने के बहाने नवंबर 2016 में पीड़िता को मौलाना की सलाह का झांसा देकर जबरन ‘निकाह हलाला’ की प्रक्रिया से गुजरने पर मजबूर किया गया। मौलाना कय्यूम ने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए, जिसके बाद 2017 में उसका अजहर से दोबारा निकाह हुआ।

इस मामले में बीएनएस की धारा 85, 115(2), 64, 351(2), 61(2)(a), 70(2), मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 3/4 और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(l)/6 और 17/18 में सैदनगली थाने में एफआईआर दर्ज हुई। विवाद यहीं नहीं थमा… साल 2021 में अजहर ने उसे दूसरी बार तीन तलाक दे दिया और दूसरी महिला से शादी कर ली। बाद में जब उसकी दूसरी पत्नी से कोई संतान नहीं हुई तो उसने बेटी का हवाला देकर पीड़िता को तीसरी बार साथ रहने का झांसा दिया।

हलाला के नाम पर महिला से गैंगरेप

इस बार अज़हर के भाइयों ने पीड़िता को डराया कि चूंकि तलाक दो बार हुआ है इसलिए ‘दोबारा हलाला’ करना होगा। 19 फरवरी 2025 को दोनों भाइयों ने हलाला के नाम पर पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म (गैंगरेप) किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नोट किया कि पहली हलाला प्रक्रिया के दौरान पीड़िता नाबालिग थी जो प्रथम दृष्टया ‘वैधानिक बलात्कार’ (Statutory Rape) का मामला बनता है। इसके बाद 2021 में उसे फिर से तलाक दिया गया। जब दोबारा सुलह की बात आई तो आरोपियों ने काफी डराया-धमकाया और महिला से कहा कि उसे दो बार तलाक मिला है इसलिए उसे दो बार हलाला करना होगा। आरोप है कि फरवरी 2025 में हलाला की आड़ में जान से मारने की धमकी देकर उसके साथ सामूहिक बलात्कार (Gang Rape) किया गया और बाद में दोबारा साथ रहने के लिए एक फर्जी निकाह का नाटक रचा गया।

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आरोपियों ने दी ये दलील

वहीं सुनवाई के दौरान आरोपियों ने दलील दी कि यह पूरा मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ और उनकी धार्मिक प्रथाओं से जुड़ा है, इसलिए एफआईआर रद्द की जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में सामने आए तथ्य विवेक को झकझोर देने वाले हैं। यह स्थिति हमारे समाज के उस हिस्से को दर्शाती है जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत गरिमा व गोपनीयता) के मूल्यों से कोसों दूर है।

कोर्ट ने लगाया फटकार

कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि जब आपराधिक कानून की बात आती है तो जब तक कानून में खुद कोई अपवाद न हो तब तक विवाह आदि को नियंत्रित करने वाले व्यक्तिगत कानूनों की आड़ लेने की कोई जगह नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध को पर्सनल लॉ का हवाला देकर संरक्षित नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में पॉक्सो (POCSO) एक्ट पूरी तरह लागू होगा। कोर्ट ने साफ किया कि एफआईआर रद्द करने के चरण में अदालत सबूतों की गहराई से जांच नहीं करती। चूंकि शिकायत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो एक्ट के तहत संज्ञेय अपराध के गंभीर आरोप बनते हैं, इसलिए पुलिस जांच को शुरुआत में ही रोका नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को कोई भी राहत देने से इनकार करते हुए तय्यब और अन्य की याचिकाएं खारिज कर दी और पूर्व में दिए गए सभी अंतरिम आदेशों को भी तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया। हाईकोर्ट द्वारा याचिकाएं खारिज किए जाने और पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेशों को हटाने के बाद अब पुलिस के लिए मामले की गहन जांच का रास्ता साफ हो गया है।

 

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