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प्रतिबंधों का प्रहार: रूस-ईरान से तेल की सप्लाई पर संकट, क्या है भारत का नया ‘इम्पोर्ट पोर्टफोलियो?

भारत के लिए अब उर्जा सुरक्षा की नई चुनौती सामने आई है क्योंकि रूस और ईरान से तेल खरीद पर जो तीस दिनों की अस्थायी छूट मिल रही थी उसे अमेरिका द्वारा समाप्त कर दिया गया हैं। मुख्य रूप से यह छूट युद्ध जैसी स्थितियों के कारण ओमान की खाड़ी में वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए दी गई थी..

By हर्ष गौतम 
Updated Date

रूस से 11 अप्रैल और ईरान से 19 अप्रैल को खत्म हुई छूट; क्या भारत फिर भी खरीदेगा डिस्काउंट वाला तेल?

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नई दिल्ली ।  भारत के लिए अब उर्जा सुरक्षा की नई चुनौती सामने आई है क्योंकि रूस और ईरान से तेल खरीद पर जो तीस दिनों की अस्थायी छूट मिल रही थी उसे अमेरिका द्वारा समाप्त कर दिया गया हैं। मुख्य रूप से यह छूट युद्ध जैसी स्थितियों के कारण ओमान की खाड़ी में वैश्विक आपूर्ति को स्थिर रखने के लिए दी गई थी।

प्रतिबंधों की समयसीमा

अमेरिका के ट्रेजरी विभाग के अनुसार, तेल आयात के लिए लागू ‘जनरल लाइसेंस’ अब खत्म हो रहे हैं। रूस से तेल आयात करने पर जो छूट मिलती थी वह 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई है और ईरान के तेल कार्गो को मिली छूट जो कि समुन्द्र में स्थित है 19 अप्रैल 2026 को समाप्त हो जाएगी। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पूरी तरह से स्पष्ट किया है कि इन छूटों को अब आगे नहीं बढ़ाया जाएगा क्योंकि इनका उद्देश्य केवल संकट के समय फंसे हुए तेल की निकासी करना था।

भारत के लिए अन्य तेल स्रोत

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रूस और ईरान पर बढ़ते दबाव के चलते भारत अब 40 से भी अधिक देशों से तेल खरीदने की रणनीति अपनाया है। भविष्य की जरूरतों को देखते हुए भारत अब गुयाना, ब्राजील, कोलंबिया और इक्वाडोर जैसे देशों से अपनी आपूर्ति बढ़ा रहा है और विशेष रूप से गुयाना से बड़े रिकॉर्ड स्तर पर खरीददारी कर रहा है। हांलाकि अमेरिका खुद भारत के लिए शेल तेल (Shale oil) का एक प्रमुख और विश्वसनीय सप्लायर बना रहेगा। इसके अलावा भारत द्वारा मध्य—पूर्व देशों पर निर्भरता कम करने के लिए नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से तेल आयात की मात्रा बढ़ाई गई है जो कि पश्चिम अफ्रिकी देश है। अगर हम बात करें भारत के लिए पारंपरिक सप्लायर्स की तो इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे बड़े तेल स्रोत बने हुए हैं, हालांकि अभी भी इनके साथ आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का विकल्प तलाशने पर चर्चा चल रही है।

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

एक्स्पर्टस का मानना है कि किफायती दरों पर मिलने वाले रूसी और ईरानी तेल की कमी से भारतीय रिफाइनरियों के मार्जिन पर असर पड़ सकता है। साथ ही यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ेगा जिससे काफी महंगाई देखने को मिल सकती है। हालाँकि, भारत सरकार ये दावा कर रही है कि मौजूदा समय में देश के पास कम से कम आठ हफ्तों का पर्याप्त तेल स्टॉक उपलब्ध है और वैकल्पिक व्यवस्थाएं पूरी तरह से एक्टिव हैं।

रिपोर्ट: सुशील कुमार साह

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