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Jagannath Rath Yatra 2026 :  सप्तपुरियों में से एक है जगन्नाथपुरी , जानें भगवान जगन्नाथ मंदिर के रहस्य

. प्राचीन सप्तपुरियों में से एक है जगन्नाथपुरी। इस पुरी नगरी को पृथ्वी का बैकुंठ कहा जाता है, वहां पर स्थित जगन्नाथ मंदिर का क्या महत्व है? यह ओडीसा राज्य में स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव (श्रीकृष्ण) के रूप में सदा निवास करते हैं।

By अनूप कुमार 
Updated Date

Jagannath Rath Yatra 2026 : प्राचीन सप्तपुरियों में से एक है जगन्नाथपुरी। इस पुरी नगरी को पृथ्वी का बैकुंठ कहा जाता है, वहां पर स्थित जगन्नाथ मंदिर का क्या महत्व है? यह ओडीसा राज्य में स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ भगवान विष्णु पुरुषोत्तम नीलमाधव (श्रीकृष्ण) के रूप में सदा निवास करते हैं।

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सात प्राचीन पुरियों में से एक इस पावन धाम में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। समुद्र के किनारे स्थित हिंदू आस्था से जुड़े इस महाधाम की वास्तुकला ही नहीं बल्कि इससे जुड़े तमाम रोचक रहस्य हैं।

मूर्तियां नीम की लकड़ी (काष्ठ) से बनी है
‘जगन्नाथ’ का अर्थ है जगत के स्वामी। देश के अन्य मंदिरों के विपरीत, यहाँ देवताओं की मूर्तियां नीम की लकड़ी (काष्ठ) से बनी हैं, जिन्हें हर 12 वर्ष में बदला जाता है।

हिंदू मान्यता के अनुसार राजा इंद्रदयुम्न ने जब भगवान विश्वकर्मा से भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों को बनाने का निवेदन किया तो उन्होंने यह शर्त रखी थी कि वे इसे बंद कमरे में बनाएंगे और उसमें कोई भी प्रवेश नहीं करेगा।

मान्यता है कि एक दिन राजा इंद्रदयुम्न ने जिज्ञासावश जब कमरे का पट खोल दिया तो भगवान विश्वकर्मा अधूरी मूर्ति को छोड़कर चले गये। तब से लेकर आज तक भगवान जगन्नाथ के साथ भगवन बलभद्र और देवी सुभद्रा की अधूरी मूर्तियां ही पूजी जाती हैं।

मान्यता है कि श्रीकृष्ण के महाप्रयाण के बाद उनका हृदय पंचतत्व में विलीन नहीं हुआ था। वही जागृत हृदय आज भी भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर ‘ब्रह्म पदार्थ’ के रूप में धड़क रहा है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु जब अपने चारों धामों की यात्रा करते हैं, तो वे बद्रीनाथ में स्नान करते हैं, द्वारका में वस्त्र बदलते हैं, पुरी में भोजन करते हैं और रामेश्वरम में विश्राम करते हैं।

महाधाम वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना
12वीं शताब्दी में गंग वंश के राजाओं द्वारा निर्मित यह भव्य मंदिर कलिंग वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है। इसके शिखर पर अष्टधातु से निर्मित नीलचक्र (सुदर्शन चक्र) स्थापित है।

भगवान जगन्नाथ रथयात्रा
भगवान जगन्नाथ हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ रथ पर सवार होकर बाहर निकलते हैं, जिसे रथ यात्रा के नाम से जाना जाता है। भगवान जगन्नाथ की यह रथ यात्रा उनके मंदिर से प्रारंभ होकर गुंडिचा मंदिर तक जाती है और 9 दिनों बाद वे वापस अपने धाम को लौट आते हैं।

मंदिर से जुड़े विस्मयकारी चमत्कार
विपरीत दिशा में ध्वज : मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
अदृश्य छाया: विज्ञान को चुनौती देते हुए, मुख्य मंदिर के गुंबद/शिखर की छाया दिन के किसी भी समय जमीन पर नहीं पड़ती।

पक्षीविहीन आकाश : इस मंदिर के शिखर के ऊपर से कोई भी पक्षी या विमान नहीं उड़ता है।

सिंहद्वार पर समुद्र की नीरवता :  मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार (सिंहद्वार) के अंदर कदम रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज पूरी तरह गायब हो जाती है।

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