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भारत-बांग्लादेश की सीमा पर अब ‘कुदरती पहरा’, सांप और मगरमच्छ बनेंगे घुसपैठियों का काल

भारत-बांग्लादेश की सरहद (India-Bangladesh Border) को सुरक्षित और अभेद्य बनाने के लिए सीमा सुरक्षा बल एक बेहद साहसी और अद्वितीय प्रस्ताव पर विचार बना रहा है। घुसपैठ और तस्करी के लिए कुख्यात 175 किलोमीटर के कठिन दलदली क्षेत्रों में अब बाड़ लगाने की जगह विषैले सांपों और मगरमच्छों को तैनात करने की योजना है।

By santosh singh 
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नई दिल्ली/कोलकाता: भारत-बांग्लादेश की सरहद (India-Bangladesh Border) को सुरक्षित और अभेद्य बनाने के लिए सीमा सुरक्षा बल एक बेहद साहसी और अद्वितीय प्रस्ताव पर विचार बना रहा है। घुसपैठ और तस्करी के लिए कुख्यात 175 किलोमीटर के कठिन दलदली क्षेत्रों में अब बाड़ लगाने की जगह विषैले सांपों और मगरमच्छों को तैनात करने की योजना है।

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रणनीतिक चुनौती : क्यों विफल रही परम्परागत तकनीक?

पश्चिम बंगाल (West Bengal) के सुंदरवन और उसके आसपास का लगभग 175 किमी का हिस्सा बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। यहाँ का इलाका घने मैंग्रोव, दलदल और नदियों से भरा हुआ है। और यहाँ की मिट्टी इतनी अस्थिर है कि लोहे की बाड़ लगाना या उसे लम्बे समय तक टिकाए रखना असंभव है।

घुसपैठियों का सुरक्षित रास्ता : तस्कर और घुसपैठिये इसी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर ऊँची घासों और पानी के रास्ते भारतीय सीमा में प्रवेश होते हैं, जहाँ मानव तस्करी करना बहुत जोखिम भरा होता है।

प्रस्तावित ‘जैविक सुरक्षा’ (Biological Deterrent)

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BSF इस दुर्गम इलाके में ‘प्राकृतिक प्रतिरोध’ उत्पन्न करने के लिए स्थानीय प्रजाति के खतरनाक जीवों का उपयोग करने पर विचार कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि पानी और दलदल में जहरीले सांपों और भूखे मगरमच्छों की मौजूदगी की खबर ही घुसपैठियों के मन में डर पैदा कर देगी और साथ ही अंधेरे में इन जहरीरे और खतरनाक जीवों से सामना होने का डर एक “अदृश्य दीवार” का काम करेगा।तकनीकी सेंसर या लगातार मानव पेट्रोलिंग के मुकाबले, इन शिकारी जीवों का प्राकृतिक निवास यहाँ सुरक्षा की एक निरंतर और सस्ती परत प्रदान करेगा।

विशेषज्ञों की राय और चुनौतियाँ

हालाँकि यह योजना रणनीतिक रूप से सटीक लग रही है, लेकिन इसे लागू करने से पहले कई पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने चेतावनी दिया है कि बड़ी संख्या में इन जीवों को एक सीमित क्षेत्र में छोड़ने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र ख़राब होने की सम्भावना भी बन सकती है। इसके अलावा सीमा पर तैनात BSF जवानों और स्थानीय ग्रामीण लोगों के लिए भी खतरा बढ़ सकता है। इस खतरे को ध्यान में रखते हुए इसके लिए एंटी-वेनम (जहर रोधी दवा) का स्टॉक रखने के साथ – साथ विशेष प्रशिक्षण अनिवार्य होगा। इसके आलावा अगर जंगली जानवरों को सुरक्षा के लिए ‘हथियार’ के रूप में उपयोग किया जायेगा तो ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार’ और ‘वन्यजीव संरक्षण संगठनों’ की बाधाएं भी आ सकती हैं।

भविष्य की राह

वर्तमान में यह प्रस्ताव ‘व्यवहार्यता अध्ययन’ के चरण में है। सीमा सुरक्षा बल इस बारे में पर्यावरण और वन मंत्रालय के साथ-साथ वन्यजीव विशेषज्ञों से सलाह ले रही है। अगर इसे हरी झंडी मिलती है, तो भारतीय रक्षा इतिहास में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग होगा जहाँ ‘प्रकृति’ को औपचारिक रूप से सीमा सुरक्षा का अंश बनाया जाएगा।

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रिपोर्ट : सुशील कुमार साह

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