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Ganeshotsav Celebration : भारत ही नहीं, दुनिया के इन देशों में होती है गणपति बप्पा की पूजा

प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता गणेश (Vighnaharta Ganesh) में हिन्दू धर्मावलम्बियों में अटूट आस्था है। कोई भी शुभ कार्य गणपति को नमन के बिना हिन्दू समाज का कोई कार्य नहीं शुरू होता है। भगवान गजानन (Lord Gajanan) सद्बुद्धि, विवेक और सुख-समृद्धि देने के साथ जीवन की विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले प्रथम देव हैं।

By santosh singh 
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नई दिल्ली। प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता गणेश (Vighnaharta Ganesh) में हिन्दू धर्मावलम्बियों में अटूट आस्था है। कोई भी शुभ कार्य गणपति को नमन के बिना हिन्दू समाज का कोई कार्य नहीं शुरू होता है। भगवान गजानन (Lord Gajanan) सद्बुद्धि, विवेक और सुख-समृद्धि देने के साथ जीवन की विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले प्रथम देव हैं। आज विश्व का शायद ही कोई कोना बचा हो जहां हिन्दू धर्मावलम्बी गणेश पूजन (Ganesh Puja)  न करते हों।

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सनातनधर्मी प्रति वर्ष गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) से लेकर अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) तक श्रद्धा-भक्ति से विघ्नहर्ता का दस दिवसीय जन्मोत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि 10 दिन के लिए भगवान गणेश (Lord Ganesha) पृथ्वी पर आते हैं और अपने भक्तों का अर्चन वंदन स्वीकार कर उनकी झोली खुशियों से भर देते हैं।

बताते चलें कि गणेश पूजन (Ganesh Puja)  की परंपरा का इतिहास केवल आस्था से ही नहीं, आजादी के आंदोलन से भी जुड़ा है। महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) ने वर्ष 1893 में देश की स्वाधीनता की जंग को नयी धार देने के लिए हिन्दू समाज में समरसता बढ़ाने के मकसद से गणेश जन्म के पारिवारिक उत्सव को सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत की थी।

हमारे देश की सांस्कृतिक पहचान को असीमित विस्तार देने में अहम भूमिका निभाने के कारण यूनेस्को के तरफ से ‘गणेशोत्सव’ को भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों में सूचीबद्ध किया जाना बड़े गर्व का विषय है। आदिदेव गणपति के लोक मंगलकारी तत्वदर्शन ने आज उन्हें न केवल समूचे भारत बल्कि वैश्विक धर्म संस्कृति में भी लोकप्रिय बना दिया है। आइए गणेशोत्सव (Ganeshotsav) के मंगल अवसर पर जानते हैं कि विदेशों में विविध धर्म-संस्कृतियों के बीच भगवान गणेश क्यों व कैसे लोकप्रिय हुए? आज वे विदेशों में किन-किन रूप-स्वरूप में पूजे जाते हैं।

अनूठी काया में है मानवीय प्रबंधन के अनूठे सूत्र

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रिद्धि-सिद्धि के प्रदाता गजानन महराज ज्ञान और विज्ञान के विलक्षण प्रतीक हैं। श्री विनायक की अनूठी काया में मानवीय प्रबंधन के ऐसे अनूठे सूत्र समाये हुए हैं जो दुनिया के किसी भी शिक्षण संस्थान में पढ़ाए नहीं जा सकते। गजानन गणेश की आकृति व भाव भंगिमाएं जितनी सम्मोहक व चित्ताकर्षक हैं, उनका तत्वदर्शन उससे भी अधिक शिक्षाप्रद है। विघ्नहर्ता का विशाल गज मस्तक सर्वोपरि बुद्धिमत्ता व विवेकशीलता का प्रतीक है। सूंड़ रूपी लंबी नाक कुशाग्र घ्राणशक्ति की द्योतक है जो हर विपदा को दूर से ही सूंघ लेती है। छोटी छोटी आंखें गहन व अगम्य भावों की परिचायक हैं जो जीवन में सूक्ष्म लेकिन तीक्ष्ण दृष्टि रखने की प्रेरणा देती हैं। उनका लंबा उदर दूसरों की बातों की गोपनीयता, बुराइयों, कमजोरियों को स्वयं में समाविष्ट कर लेने की शिक्षा देता है। बड़े-बड़े सूपकर्ण कान का कच्चापन न होने की सीख देते हैं। उनकी स्थूल देह में वह गुरुता निहित है जो गणनायक में होनी चाहिए। गणपति का वाहन मूषक चंचलता एवं दूसरों की छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रेरक है। गणेश हेरंब रूप में शौर्य, साहस तथा नेतृत्व के भी प्रतीक हैं।

प्रतीकों के तत्वज्ञान ने बनाया विदेशों में लोकप्रिय

अपने अनूठे प्रतीकों के कारण भगवान गणेश (Lord Ganesha) विश्व के अनेक देशों में बाधाओं को हरने वाले, ज्ञान-विवेक, सुख-समृद्धि व सौभाग्य के प्रदाता के रूप में पूज्य हैं। गणेश जी की यह वैश्विक लोकप्रियता विभिन्न धर्म संस्कृतियों को जोड़ने वाली कड़ी साबित हो रही है। गणेश जी के प्रतीकों के तत्वज्ञान ने आज उन्हें वैश्विक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना दिया है।

विदेशों में कैसे पहुंचे गजानन गणेश?

गाणपत्य धर्म के अनुयायी व्यापारियों और प्रवासी भारतीयों के तरफ से गणेश की पूजा दक्षिण एशिया, तिब्बत, चीन, जापान, और दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न देशों में फैली। व्यापार मार्गों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से गणेश पूजा का प्रसार हुआ। इंडोलाजिस्ट ललित शर्मा की मानें तो बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच घनिष्ठ संबंधों के कारण गणेश पूजा विशेष रूप से तिब्बत, भूटान, चीन और जापान के साथ अनेक अन्य देशों में भी लोकप्रिय हुई। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार भारत के प्राचीन व्यापारिक सम्बन्ध दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया, मध्य एशिया और यूरोप और अफ्रीका के देशों से भी थे। समुद्री और थल व्यापार मार्गों के माध्यम से भारतीय संस्कृति, धर्म और विचारधारा अन्य देशों में पहुंची। इस प्रक्रिया में गणेश जी की पूजा भी इन देशों में प्रचलित हो गई।

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विशेष रूप से, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया और म्यांमार में, जहां भारतीय व्यापारियों के माध्यम से हिंदू धर्म का प्रभाव पहुंचा। वहां गणेश जी की मूर्तियां और मंदिर पाया जाना गजानन की वैश्विक स्वीकार्यता का ही पर्याय है। तांत्रिक बौद्ध धर्म में गणेश जी की विशेष मान्यता है। भारतीय भिक्षु जब भारत से तिब्बत, चीन, जापान, और अन्य एशियाई देशों में पहुंचे तो अपने साथ गणेश जी को भी ले गये। वहीं वर्तमान समय की बात करें तो विदेशों में भगवान गणेश की पूजा को लोकप्रिय बनाने में भारतीय प्रवासियों का योगदान बहुत सराहनीय है।

भारतीय प्रवासियों ने अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों में अपने धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहारों को जीवित रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। साथ ही भारत की संस्कृति और आध्यात्मिकता के प्रति बढ़ते आकर्षण ने विदेशी लोगों को भगवान गणेश के महत्व को समझने और अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

जानें कौन से हैं देश जहाँ पूजे जाते हैं भगवान गणेश

नेपाल : नेपाल में भगवान गणेश (Lord Ganesha)  की पूजा का एक लंबा इतिहास है। कहा जाता है कि सम्राट अशोक की पुत्री चारूमित्रा ने नेपाल में भगवान गणेश का मंदिर स्थापित किया था। यहां लोग गणेश जी को संकटमोचक और सिद्धिदाता के रूप में पूजते हैं। नेपाल में भगवान गणेश का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है।

तिब्बत : तिब्बत में भगवान गणेश (Lord Ganesha)  की पूजा की शुरुआत बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से 11वीं सदी में हुई । तिब्बत में गणेश पंथ के प्रचारक गयाधरा कश्मीर से गये थे। तिब्बत में गणेश जी को बुरी आत्माओं से रक्षा करने वाले देवता के रूप में माना जाता है। हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म के बीच घनिष्ठ संबंध होने के कारण तिब्बत में गणेश पूजन खासा लोकप्रिय है। वे वहां सांस्कृतिक आदान-प्रदान के प्रतीक माने जाते हैं।

श्रीलंका : श्रीलंका में भगवान गणेश (Lord Ganesha)  को तमिल भाषा में “पिल्लयार” के नाम से जाना जाता है। यहां गणेश जी के 14 प्राचीन मंदिर हैं। श्रीलंका के कोलंबो शहर के पास केलान्या गंगा नदी के तट पर स्थित बौद्ध मंदिरों में भी भगवान गणेश की मूर्तियां स्थापित हैं। श्रीलंका के लोग विशेष रूप से काले पत्थर से बनी गणपति प्रतिमा का पूजन करते हैं।

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जापान : जापान में भगवान गणेश (Lord Ganesha)  को “कांगितेन” के रूप में जाना जाता है। जापानी बौद्ध धर्म में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। जापान में ‘कांगितेन’ का दो शरीर वाला रूप सबसे प्रचलित है। जापान में गणेश की पूजा विशेषत: तांत्रिक बुद्धिज्म के अनुयायी करते हैं और यहाँ उन्हें ‘’विनायक’’ के रूप में भी पूजा जाता है। जापान के मंदिरों में भगवान गणेश की मूर्तियाँ दिखती हैं, खासकर मात्सुचियामा शोटेन मंदिर जो टोक्यो के असाकुसा में स्थित है।

थाईलैंड : थाईलैंड में भगवान गणेश (Lord Ganesha)  का पूजन “फ्ररा फिकानेत” के रूप में किया जाता है। उन्हें सभी बाधाओं को दूर करने और सफलता के देवता के रूप में पूजा जाता है। यहां गणेश चतुर्थी को विशेष महत्त्व दिया जाता है और नयी शुरुआत, जैसे विवाह और व्यापार के लिए उनकी विशेष पूजा की जाती है।

इंडोनेशिया : इंडोनेशिया में भारतीय धर्म का प्रभाव पहली शताब्दी से माना जाता है। यहां भगवान गणेश (Lord Ganesha)  को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इंडोनेशियाई मुद्रा के 20,000 रुपये के नोट पर भी भगवान गणेश की तस्वीर है, जो उनके महत्व को दर्शाती है।

वियतनाम और कंबोडिया : वियतनाम और कंबोडिया में हिंदू धर्म का प्रभाव प्राचीन काल से देखा जाता है। यहां गणेश की पूजा बौद्ध धर्म के साथ-साथ हिंदू धर्म के मिश्रित रूपों में की जाती है। इन देशों के कई प्राचीन मंदिरों में गणेश जी की मूर्तियां मिली हैं।

चीन : चीन के प्राचीन हिंदू मंदिरों में चारों दिशाओं के द्वारों पर भगवान गणेश (Lord Ganesha)  की मूर्तियाँ स्थापित हैं। यहां उन्हें बाधाओं को दूर करने वाले देवता के रूप में माना जाता है। चीनी संस्कृति में भी गणेश की पूजा उन्हें संकटों से मुक्ति दिलाने वाले के रूप में की जाती है।

मेक्सिको और अन्य लैटिन अमेरिकी देश : दिलचस्प बात है कि कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में भी भगवान गणेश (Lord Ganesha)  की मूर्तियां पायी गयी हैं। हालांकि वहां उनका पूजन हिंदू प्रवासियों के माध्यम से होता है, फिर भी भगवान गणेश (Lord Ganesha)  की लोकप्रियता ने कई देशों में उन्हें मान्यता दी है।

अफगानिस्तान और ईरान : प्राचीन अफगानिस्तान और ईरान में भी भगवान गणेश की मूर्तियां और मंदिर पाए गए हैं। भारत के साथ प्राचीन व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों के कारण इन क्षेत्रों में भी गणेश जी की पूजा की जाती थी।

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